शंकरशेष कृत नाटक ‘एक और द्रोणाचार्य
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‘एक और द्रोणाचार्य नाटक’ का मुख्य बिंदु
एक और द्रोणाचार्य’ नाटक का प्रकाशन 1977 में हुआ था। कुछ लोग इस नाटक का प्रकाशन वर्ष 1971 भी बताते हैं।
शंकरशेष हिन्दी के साठोत्तरी पीढ़ी के सुप्रसिद्ध नाटककार थे। वे कवि और कहानीकार भी थे किन्तु नाटककार के रूप में वे अधिक प्रसिद्ध हुए।
एक और द्रोणाचार्य नाटक में वर्तमान शिक्षक की तुलना उस द्रोणाचार्य से किया है जिसने एक शिक्षक को अपने सिद्धान्तों से समझौता करते हुए अन्याय सहने की परम्परा दे दिया।
नाटककार ने पौराणिक कथा के माध्यम से आधुनिक समस्या का हल ढूंढने का प्रयास किया है।
इस नाटक में नाटककार ने वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार, पक्षपात, राजनितिक घुसपैठ तथा आर्थिक एवं सामाजिक दबावों के चलते निम्न मध्यवार्गीय व्यक्ति के असहाय बेबस चरित्र को उद्घाटित किया है।
महाभारत कालीन प्रसिद्ध पात्र द्रोणाचार्य के जीवन प्रसंगों को आधार बनाकर वर्तमान विसंगति को दिखाया गया है।
नाटक का दो भागों में विभाजन किया गया है। पूर्वार्ध और उत्तरार्द्ध। पूर्वार्ध में चार (4) दृश्य हैं। उत्तरार्द्ध में सात (7) दृश्य हैं।
नाटक का पात्र परिचय: इस नाटक में दो तरह की कहानियाँ चलती है। दोनों कहानियों के पात्र अलग-अलग हैं। एक कहानी महाभारत के द्रोणाचार्य की है और दूसरी कहानी आज के समय के प्रोफेसर अजय की है।
पौराणिक पात्र: द्रोणाचार्य, एकलव्य, कृपी (द्रोणाचार्य की पत्नी), अश्वस्थामा (द्रोणाचार्य का पुत्र), भीष्म, अर्जुन, युधिष्ठिर, सैनिक।
आधुनिक पात्र:
अरविंद: (नाटक का प्रमुख पात्र प्रोफेसर)
लीला: अरविंद की पत्नी
यदू: अरविंद का साथी, जूनियर प्रोफ़ेसर
प्रिसपल: 60 वर्ष का है
एक और द्रोणाचार्य’ नाटक का प्रकाशन 1977 में हुआ था। कुछ लोग इस नाटक का प्रकाशन वर्ष 1971 भी बताते हैं।
शंकरशेष हिन्दी के साठोत्तरी पीढ़ी के सुप्रसिद्ध नाटककार थे। वे कवि और कहानीकार भी थे किन्तु नाटककार के रूप में वे अधिक प्रसिद्ध हुए।
एक और द्रोणाचार्य नाटक में वर्तमान शिक्षक की तुलना उस द्रोणाचार्य से किया है जिसने एक शिक्षक को अपने सिद्धान्तों से समझौता करते हुए अन्याय सहने की परम्परा दे दिया।
नाटककार ने पौराणिक कथा के माध्यम से आधुनिक समस्या का हल ढूंढने का प्रयास किया है।
इस नाटक में नाटककार ने वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार, पक्षपात, राजनितिक घुसपैठ तथा आर्थिक एवं सामाजिक दबावों के चलते निम्न मध्यवार्गीय व्यक्ति के असहाय बेबस चरित्र को उद्घाटित किया है।
महाभारत कालीन प्रसिद्ध पात्र द्रोणाचार्य के जीवन प्रसंगों को आधार बनाकर वर्तमान विसंगति को दिखाया गया है।
नाटक का दो भागों में विभाजन किया गया है। पूर्वार्ध और उत्तरार्द्ध। पूर्वार्ध में चार (4) दृश्य हैं। उत्तरार्द्ध में सात (7) दृश्य हैं।
नाटक का पात्र परिचय: इस नाटक में दो तरह की कहानियाँ चलती है। दोनों कहानियों के पात्र अलग-अलग हैं। एक कहानी महाभारत के द्रोणाचार्य की है और दूसरी कहानी आज के समय के प्रोफेसर अजय की है।
पौराणिक पात्र: द्रोणाचार्य, एकलव्य, कृपी (द्रोणाचार्य की पत्नी), अश्वस्थामा (द्रोणाचार्य का पुत्र), भीष्म, अर्जुन, युधिष्ठिर, सैनिक।
आधुनिक पात्र:
अरविंद: (नाटक का प्रमुख पात्र प्रोफेसर)
लीला: अरविंद की पत्नी
यदू: अरविंद का साथी, जूनियर प्रोफ़ेसर
प्रिसपल: 60 वर्ष का है
चंदू: अरविंद का छात्र 20 वर्ष,
अरविंद के कॉलेज का प्रेसिडेंट
विमलेंदु: मृत शिक्षक
अनुराधा: छात्रा, 20 वर्ष की

